Monday, December 28, 2015

अधखुले द्वार।

एक कोशिश - शब्दों के द्वारा अभिव्यक्ति की 
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वे अधखुले द्वार
जहाँ से बाहर निकलने की उमंग
और भीतर रह जाने की निराशा
प्रतिक्षण बदलता प्रतिबिम्ब

द्वार के उस पार
है अनंत विस्तार
जीवन,रंग और उत्सव
सत्य जहाँ अनुभव है
कोई नियम नहीं
प्रकृति पर्याप्त है जहाँ
अस्तित्व को समझने के लिए

द्वार के इस पार
है घुटन,अंधकार और कुंठित विचार
सत्य यहाँ नियम है
ठोस, शुष्क और मृत
अस्तित्व की पहेली क़ैद है यहाँ
किन्ही पुस्तको में, विचारो में

मर चुकी है मनुष्यता
अधखुले द्वार के भीतर 
झूठे सत्य की तलाश में

झूठे, थोपे हुए सत्य 
पैदा करते है द्वंद
और उस द्वंद से उपजा संघर्ष
बन जाता है घर्षण
जो केवल घिसता है और खो जाता है

द्वार अभी भी अधखुला है

नही, अब द्वार खोलना होगा
आधा नही, पूरा-पूरा 
और जाननी होगी सत्य की स्थिति
द्वार के इस पार या द्वार के उस पार
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【Pic - Thomas Kinkade's painting "The open gate"】

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