Monday, November 18, 2019

साइकिल।

कच्चे रास्तों के ऊपर खडंजे बन गए
खडंजों को उखाड़ कर रास्तों को पक्का किया गया
मेरी साइकिल जब खडंजों पर चलती
तो उछलती, खड़खड़ाती, बिखरती थी
लेकिन जबसे रास्ते पक्के हुए हैं
उनपर बड़े रौब से भागती है सरपट
उसे सब कुछ मिला जो उसकी चाल को धार दे
कि इसके बावजूद कुछ अधूरा रह गया
कच्चे रास्तों की कोमलता अब उसके नसीब में नही थी


Sunday, November 3, 2019

हमने प्रेम को देखा संबंधों में।

हमने प्रेम को देखा संबंधों में

संबंध
कच्चे धागों से जुड़े बिंब
नीति - निर्धारित जोड़
अब जोड़ है तो तोड़ भी होगा
टूटन है तो बिखराव भी होगा

प्रेम
कहां एक शाश्वत अनंत
पर्वतों की उचाईयों से
सागर की गहराइयों तक व्याप्त
मृत्यु के पार भी जो
ढूंढ ले जीवन

कितना बड़ा दुर्भाग्य कि
प्रेम को हमने संबंधों में देखा
प्रेम को नहीं देखा
हमने संबंधों को देखा।




Monday, August 26, 2019

मौन - १


जब प्रेम की अनुभूति सबसे गहन थी 
तब तो कुछ कह न पाया 
अक्सर कहने से बचता हूं मैं 
बचता हूं मुलायम एहसासों को शब्द देने से
शब्द रूखे होते है 
छिल देते है जगह-जगह
मौन की गोद में पलती है संवेदना
मौन ही उसकी भाषा है 
मौन संस्कार है
पहाड़ों का सिर जो इतना ऊंचा है 
क्योंकि उनकी जड़ों को सींचती हैं नदियां
भारहीन होकर रेंग रहा हूं मैं 
अब एकबार को चिड़ियाएँ कूक दें 
तो कोई बात बने



Wednesday, August 21, 2019

A letter to my younger self.


इससे पहले किसी को प्रेम करने जाना
अपने भीतर प्रेम का दीपक जला लेना,
प्रेम हुए बिना प्रेम करना
तुम्हारे भीतर के अहंकार के पोषण की युक्ति भर है फिर अगले ही क्षण तुम प्रेम मांगना शुरू कर दोगे

इससे पहले तुम दुनिया बदलने जाना
तुम अपने आत्मा को परिष्कृत कर लेना,
ख़ुद के भीतर बदलाव की एक लौ भर जला लेना, नहीं तो दुनिया तो हिटलर भी बदलना चाहता था

तुम्हारी किसी के प्रति कोई जवाबदेही नही है
सिवाय अपने स्वचेतना के,
अपनी आत्मचेतना के प्रति ईमानदार रहना
यही सत्य है, शिव भी यही है और यही सुंदरतम् है।



Thursday, February 14, 2019

कोई कविता बुरी नही होती।

कोई कविता बुरी नही होती

शब्द हल्के हो सकते हैं
भाव कच्चे हो सकते हैं
लय-छंद बिखरे हो सकते हैं
लेकिन कविता बुरी नही हो सकती

कि तुम्हारे भीतर से कुछ फूटा तो सही
कच्चा-पक्का कुछ टूटा तो सही
ये टूटना शुभ है

कहीं ऐसा तो नही
जिसे संजोया है इतने जतन से
वही मन पे भार बना बैठा हो
जिसे तुमने समझा बेकार-बेतुका
वही जीवन का सार बना बैठा हो

जरूरी तो नही
जिसे प्रेम किया तुमने
वह भी तुम्हे चाहे उसी अनुपात में
जिसे जाने दिया तुमने
लौट आए किसी घनघोर अंधेरी रात में

जो इक्कठा किया है भीतर
उसे टूटना तो होगा
चैतन्य को पीना है तो
भावो को फूटना तो होगा

माना कि तुम्हारे लिखे पर कोई दाद न दे
तुम्हारे शब्दों को, भावो को खाद न दे
तो क्या मौन संगीत में झूमोगे नहीं
कविताओं में ही सही
क्या उसका माथा चूमोगे नही

मन पे जो भार है उसे पन्नों पर उतार दो
लय की फिक्र छोड़ो जो आता है बघार दो

कि कोई कविता बुरी नही होती।

@दिग्विजय


मृत्यु।

मैं चाहता हूं हर चीज़ एक समय के बाद नष्ट हो जाए
न रहे उसकी कोई महक, सुवास
मर जाए घृणा, द्वेष यहां तक कि प्रेम भी
की मृत्यु को हमने अपमानित भर किया है
मरना होगा उसे, क्योंकि देना होगा पुरातन को नया प्रतिमान

नष्ट हो जाए, ताकि बची रहे उसकी सुंदरता
कि नष्ट होना प्रमाणिक है
और मृत्यु शाश्वत

मैं होना चाहता हूं कुछ ऐसा

जो एक भरपूर सांस लेने के बाद हो जाए निढाल
मेरे भीतर एक गहरा खालीपन है
और जरूरी नहीं उसे भरना

@दिग्विजय