जब प्रेम की अनुभूति सबसे गहन थी
तब तो कुछ कह न पाया
अक्सर कहने से बचता हूं मैं
बचता हूं मुलायम एहसासों को शब्द देने से
शब्द रूखे होते है
छिल देते है जगह-जगह
मौन की गोद में पलती है संवेदना
मौन ही उसकी भाषा है
मौन संस्कार है
पहाड़ों का सिर जो इतना ऊंचा है
क्योंकि उनकी जड़ों को सींचती हैं नदियां
भारहीन होकर रेंग रहा हूं मैं
अब एकबार को चिड़ियाएँ कूक दें
तो कोई बात बने

