Monday, August 26, 2019

मौन - १


जब प्रेम की अनुभूति सबसे गहन थी 
तब तो कुछ कह न पाया 
अक्सर कहने से बचता हूं मैं 
बचता हूं मुलायम एहसासों को शब्द देने से
शब्द रूखे होते है 
छिल देते है जगह-जगह
मौन की गोद में पलती है संवेदना
मौन ही उसकी भाषा है 
मौन संस्कार है
पहाड़ों का सिर जो इतना ऊंचा है 
क्योंकि उनकी जड़ों को सींचती हैं नदियां
भारहीन होकर रेंग रहा हूं मैं 
अब एकबार को चिड़ियाएँ कूक दें 
तो कोई बात बने



Wednesday, August 21, 2019

A letter to my younger self.


इससे पहले किसी को प्रेम करने जाना
अपने भीतर प्रेम का दीपक जला लेना,
प्रेम हुए बिना प्रेम करना
तुम्हारे भीतर के अहंकार के पोषण की युक्ति भर है फिर अगले ही क्षण तुम प्रेम मांगना शुरू कर दोगे

इससे पहले तुम दुनिया बदलने जाना
तुम अपने आत्मा को परिष्कृत कर लेना,
ख़ुद के भीतर बदलाव की एक लौ भर जला लेना, नहीं तो दुनिया तो हिटलर भी बदलना चाहता था

तुम्हारी किसी के प्रति कोई जवाबदेही नही है
सिवाय अपने स्वचेतना के,
अपनी आत्मचेतना के प्रति ईमानदार रहना
यही सत्य है, शिव भी यही है और यही सुंदरतम् है।