Thursday, March 26, 2020

मौन - २

मौन साधना इतना कठिन भी न था
लेकिन मैंने चुना कोलाहल
कोलाहल उद्वेलित करती है
छीन लेती है तुम्हारा सर्वस्व

मैं अस्तित्व का ही हिस्सा हूं
अस्तित्व ने सींचा मुझे
अस्तित्व में खोना ही मेरी नियति है

लेकिन मैंने भुलाया खुद को
जितना संभव हो सकता था
भुलाते भुलाते मैं उस दोराहे पर पहुंच चुका हूं कि
तुम्हारा सानिध्य भी मुझे विरक्त करता है
आग में जलना सुकून प्रतीत होता है
शीतलता असहनीय हो चुकी है

अब कोलाहल बेबर्दाश्त है
और मौन चुनना विवशता
लेकिन विवशता में शुभ
कभी घटित होता है भला।

- दिग्विजय

चित्र - इंस्टाग्राम